बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

भारत में स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियां

संपादकीय
भारत में स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियां

देश में स्वस्थ्य सेवाओं को लेकर कई बार सवाल उठाए जाते हैं। देश में आम नागरिकों को पर्याप्त रूप से बुनियादी स्वस्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। सुविधाओं के अभाव में बड़ी संख्या में गरीब लोगों को महंगी स्वास्थ्य सेवाएं लेने पर विवश होना पड़ता है। जो ऐसा नहीं कर पाते, उन्हें इलाज के अभाव में अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। यूं तो एलोपैथी, आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियाँ विद्यमान हैं लेकिन जल्दी स्वास्थ्य लाभ के लिए अधिकांश लोग एलोपैथी को ही अपनाते हैं,जो अन्य के मुक़ाबले आसानी से उपलब्ध भी है।सबके लिए स्वास्थ्य अभी भी एक नारा ही बना हुआ है। नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने प्रतीची (इंडिया) ट्रस्ट की ग्यारहवीं कोलकाता समूह कार्यशाला में प्रेस को संबोधित करते हुए सेन ने कहा था किस्वास्थ्य सेवा की स्थिति बेहद निराशाजनक है। हम निजी स्वास्थ्य सुविधाओं के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इन्हें सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की जगह नहीं लेनी चाहिए।सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता और निजी स्वास्थ्य सेवा पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से कम जानकारी रखने वाले रोगियों और उनके परिवारों का उत्पीड़न होगा। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भारत को बांग्लादेश, थाईलैंड और चीन जैसे देशों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।` आठ साल पहले तक सोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर के प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों और सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों में चिकित्‍सा विशेषज्ञों के आधे से भी अधिक पद रिक्‍त थे। वर्ष 2007-08 तक सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों की संख्‍या 5000 हो जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका
हाल ही प्रदेश में स्वाइन फ्लू का प्रकोप फैला तो सारी सुविधाएं जुटाने के दावे किए गए,प्रशासन ने मॉनिटरिंग का काम भी किया, लेकिन 100 से अधिक लोगों की जानें चली गईं और डाक्टर यही इंतजार कर रहे हैं  कि कब सर्दी का प्रकोप कम हो और स्वाइन फ्लू से छुटकारा मिले।स्कूलों में सामूहिक प्रार्थना सभाएं निरस्त कर दी गयी। जयपुर जैसे महानगर में तो लोग निजी बड़े अस्पतालों का लाभ भी उठा लेते हैं,लेकिन छोटे शहरों, कस्बों और गावों की ओर देखने वाला कोई नहीं है।
एलोपैथी के बाद लोग आयुर्वेद का सहारा लेते हैं लेकिन वहां भी सुविधाओं का घोर अभाव है। यहां तक कि वहां पानी-बिजली तक की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं है।इन अस्पतालों में बजट के अभाव का रोना रोया जाता है, क्योंकि सर्वाधिक बजट एलोपैथी अस्पताल खींच लेते हैं।  अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों में पर्याप्त विकित्सक और पेरा-मेडिकल स्टाफ ही नहीं है तो मरीज़ कहां गुहार करें?
बढ़ती जनसंख्या, गरीबी और कमजोर बुनियादी ढांचे के कारण भारत के सामने दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा की चुनौती बनी हुई है।यह स्वीकार करना होगा कि हमने विभिन्न क्षेत्रों में काफी अच्छी प्रगति कर ली हो,लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र में हम काफी नीचे हैं। हमारे चिकित्सक मेडिकल शिक्षा पूरी करते विदेश की ओर रुख करते हैं क्योंकि वहां उन्हें अच्छा पैकेज मिलता है या वे निजी क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की फिराक में रहते हैं। स्वेच्छा से कोई चिकित्सक गांवों में जाकर सेवा करना नहीं चाहता। सरकार की ओर से भी उन्हें कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। विशेषज्ञों की सेवाएं तो वर्षों तक गांवों में नहीं पहुंच पाती। पाती।गौरतलब है कि ब्राजील जैसे विकासशील देश में प्रति हजार लोगों पर अस्पतालों में शैयाओं की उपलब्धता 2.3 है पर भारत में यह आंकड़ा केवल 0.7 को छू पाता है।श्रीलंका में यह आंकड़ा 3.6 का और चीन में 3.8 का है। डाक्टरों की उपलब्धता का वैश्विक औसत 1.3 है जबकि भारत में यह केवल 0.7 है। हमारे पास 4 लाख डाक्टरों, 7 लाख शैयाओं और लगभग 40 लाख नर्सों की कमी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, जिनसे 30 हजार की आबादी और उप-केंद्रों, जिनसे पांच हजार की आबादी कवर करने की उम्मीद की जाती है, का या तो अस्तित्व ही नहीं है या फिर जहां वे हैं, उनमें कर्मचारियों की भारी कमी बनी है। केवल 38  फीसदी केंद्रों के पास ही आवश्यक कर्मचारी और 31 फीसदी के पास जरूरी सामान हैं। यद्यपि 73 फीसदी भारतीय देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं जबकि 75 फीसदी से ज्यादा डाक्टर शहर आधारित हैं। आज भी 90 फीसदी से अधिक ग्रामीण आबादी को बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के लिए न्यूनतम आठ से दस किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है।
भारत की सबसे बड़ी चुनौती संक्रामक और असंक्रामक बीमारियों, कैंसर, मधुमेह और तपेदिक में बढोतरी से मौतों की बढती संख्या है। इसके अलावा नित-नई नई बीमारियों का पता चलता रहता है, जिनसे निपटने की हमारी कोई तैयारी नहीं होती। भारत में मधुमेह के रोगियों की संख्या पहले 2020 तक 3.6 करोड़ आंकी गई थी, जो अब 7.5 करोड़ से आगे निकल चुकी है। जल्द ही दुनिया में हर पांचवां मधुमेह रोगी भारतीय होगा। भारत दुनिया में तपेदिक का सबसे ज्यादा बोझ वाला देश भी है। भारत में कुल 26 फीसदी टीबी के मरीज हैं। हमारी स्लम बस्तियों तो रोग के घर ही हैं। भारत में स्वास्थ्य सेवा खर्च का 70  फीसदी निजी क्षेत्र से आता है जबकि वैश्विक औसत 38 फीसदी है और जब विकसित देशों के साथ तुलना करें तो यह आंकड़ा और भी ज्यादा है। इसके अलावा, चिकित्सा पर निजी व्यय का 86 फीसदी तक अपनी जेब से चुकाना होता है, जो यह प्रदर्शित करता है कि देश में बीमा की पैठ कितनी कम है। कुल स्वास्थ्य सेवा खर्च और बुनियादी ढांचे की आपूर्ति दोनों ही दृष्टि से हमारा देश कई विकसित और विकासशील देशों से अब भी पीछे है। सरकार जीएसटी, निजीकरण, अनुदानों, श्रम, प्रतिरक्षा, बीमा, बैकिंग, कोयला, बिजली और गैस मूल्य निर्धारण से संबंधित सुधारों पर फोकस कर रही है, जबकि स्वास्थ्य सुधारों पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, अगले कुछ वर्षों में जीवन प्रत्याशा में बढोतरी के कारण बड़ी संख्या में भारतीय 65 वर्ष की उम्र पार कर जाएंगे। उम्रदराज हो रही इस आबादी को सुविधाएं और स्वास्थ्य सेवा समेत आवश्यक सामाजिक सुरक्षा देने की दिशा में बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है।योजना आयोग के अनुसार 44 हजार डाक्टरों की बढी हुई आपूर्ति भी वर्ष 2020  की अनुमानित मांग के केवल 78  फीसदी हिस्से की ही पूर्ति कर पाएगी, जिससे प्रति 1000 लोगों पर 0.3 डाक्टरों का अंतर तब भी शेष रह जाएगा। भारतीय मेडिकल टूरिज्म इंडस्ट्री सालाना 20 फीसदी की स्वास्थ्य देखभाल खर्च दर से बढ़ रही है, जिसके 2018  तक 6 अरब डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद है।इससे भारत आने वाले मेडिकल पर्यटकों की संख्या मौजूदा 2 लाख 30 हजार से बढ़कर 4 लाख हो जाएगी। मौजूदा वृद्धि दर से स्वास्थ्य सेवा उद्योग न केवल भारत के गरीबों की कम सेवा कर पाएगा बल्कि मेडिकल पर्यटकों की उससे भी कम सेवा कर पाएगा, जिनमें विदेशी पूंजी लाने की काफी क्षमता है।अभी तक क्लिनिकल और सुविधा आधारित स्वास्थ्य सेवा के लिए ही फाइनेंसिंग या वित्त पोषण पर काफी फोकस रहा है और इस प्रक्रिया में रोगों से बचाव, उनकी रोकथाम और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यों की अनदेखी कर दी गई है। संक्रामक एवं पुरानी दोनों ही प्रकार की बीमारियों के लिए सरकारी कदमों के जरिये रोकथाम जरूरी है। स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश के साथ साथ प्रणालीगत सुधारों की महती आवश्यकता है ताकि नियंत्रण और निगरानी के मुद्दों समेत सेवा प्रदान करने की मौजूदा व्यवस्था की पूरी तरीके से जांच इसमें सकारात्मक बदलाव लाया जा सके ऐसा अनुभव किया जा रहा है कि देश को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नियामक बनाकर सार्वभौमिक स्वास्थ्य मुद्दों की निगरानी करनी होगी तभी बात बनेगी।
-फारूक आफरीदी, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार


गुरुवार, 15 जनवरी 2015

सूचना के अधिकार कानून के बुरे दिन



संपादकीय

सूचना के अधिकार कानून के बुरे दिन

 

देश में आम आदमी को जन हित की योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में जानने या सूचना पाने का अधिकार देने के लिये दस साल पहले यूपीए सरकार के दौरान संसद ने जो कानून पारित किया था, वह इन दिनों बुरे दौर से गुजर रहा है। आज हालात ये हैं कि सूचना के अधिकार के तहत बार-बार मांगने पर भी सरकारी विभागों से सूचनाएं नहीं मिल पाती या अधिकारी आधी-अधूरी सूचनाएं देकर जैसे-तैसे अपना पिंड छुड़ाकर इतिश्री कर लेते हैं। क़ानून बनने के बाद राज्यों में सूचना आयोग तो बना दिये गए हैं लेकिन उनमें पर्याप्त संख्या में सूचना आयुक्त और सक्षम कार्यकारी स्टाफ सेवारत नहीं हैं। इन आयोगों के सुचारु संचालन की ज़िम्मेदारी मूलत: राज्य सरकारों की है, लेकिन यह विषय जैसे उनकी प्राथमिकता सूची में ही नहीं है। सामाजिक और स्वयंसेवी संगठन इस संस्था की सक्रियता बनाए रखने को लेकर निरंतर अदालतों के दरवाजे खटखटाते रहते हैं तब भी सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। ऐसा लगता है कि सूचना का अधिकार सरकार के लिए गले की घंटी और उस पर परेशानी के बादल जैसे हैं।
देश में सूचना के अधिकार कानून को सबसे पहले लागू करने में राजस्थान प्रदेश अग्रणी रहा है,लेकिन यहां मुख्य आयुक्त के अलावा सिर्फ एक सूचना आयुक्त काम कर रहा है। राज्य सूचना आयोग में आने वाली दूसरी अपील के लगभग 16 हजार आवेदन विचाराधीन हो गए हैं। अपील की सुनवाई के लिए लोगों को जनवरी 2016 तक की तारीख दी जा रही है। ऐसे में इस कानून की क्या उपयोगिता और प्रासंगिकता रह जाती है।सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में यहां हालत बहुत खराब रही है। राजस्थान में सूचनाएं मांगने वालों का जो फ़्लो बना हुआ है और बढ़ती जागरूकता के कारण जितने प्रकरण आ रहे हैं, उनके निपटारे और पेंडिंग अपीलों की सुनवाई कर फैसलों के लिए राज्य में दस सूचना आयुक्त हो सकते हैं। लगभग तीन चार साल से यहां एक ही सूचना आयुक्त टी. श्रीनिवासन काम कर रहे हैं। अब एक सूचना आयुक्त और लगाया गया है।
सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देशों के कारण उन्होंने छह माह से ज्यादा समय तक काम नहीं किया। इससे अपीलों की संख्या बहुत बढ़ गई। राज्य सरकार को जनहित में आयोग में जरूरत के अनुरूप आयुक्तों की संख्या बढ़ाने पर विचार कर निर्णय लेना चाहिए।दरअसल सूचना के अधिकार कानून के तहत पहली अपील में तो एक माह में सुनवाई का प्रावधान है,लेकिन दूसरी अपील जो सूचना आयुक्त के यहां होती है, वहां सुनवाई के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं है।ऐसे में अपीलों की सुनवाई पर डेढ़ साल तक का समय दिया जा रहा है। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में कोई बड़ी समस्या भी नहीं है,क्योंकि मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और एक कैबिनेट मंत्री की समिति इनका चयन करती है।
यहां यहकहना प्रासंगिक होगा कि सूचना का अधिकार कानून एक बड़ी पहल थी।इस कानून के लागू होने के बाद महानरेगा सहित कई बड़े मामलों में अनियमितता और भ्रष्टाचार  उजागर हुए।लेकिन,दस सालों के बाद सूचना के अधिकार की स्थिति आज एक प्रकार तरह से चिंतनीय होती जा रही है।विकास,निवेश,स्वच्छता अभियानों आदि की आंधी में सूचना का अधिकार कहीं खो गया है।केन्द्र या राज्य सरकारो के एजेंडे में यह कहीं नजर नहीं आता। इसकी राह का सबसे बड़ी बाधा यह है कि सूचना आयोगों में लंबित मामलों की तादाद उतरोत्तर बढ़ती जा रही है। कई अपीलों के निपटारे में दो साल से तीन साल या इससे भी ज्यादा समय लगना आम बात है, जिससे सूचना के अधिकार कानून के अप्रासंगिक हो जाने की स्थिति पैदा हो गयी है।
राष्ट्रीय सूचना आयोग में ही पिछले साल अगस्त तक सात हजार छह सौ से अधिक मामले विचाराधीन थे।नवंबर तक इनकी तादाद बढ़ कर दस हजार से ऊपर पहुंच गई।लंबित मामलों और पदों के रिक्त रहने की समस्या राष्ट्रीय सूचना आयोग तक ही सीमित नहीं है।राज्यों में हालात और खराब दिखाई देते हैं।आयुक्तों के पद समय से नहीं भरे जाते, तो इसकी खासकर दो वजहें हैं। एक तो यह कि सरकारों की दिलचस्पी इसमें नहीं होती कि आयोग अपनी पूरी क्षमता से काम करें और दूसरे, वे अपने चहेतों को सूचना आयुक्त बनाने के फेर में रहती हैं। सूचना आयोगों का गठन इसलिए किया गया था कि अगर प्रशासनिक अधिकारी निर्धारित समय में मांगी गई सूचना देने से मना करें तो आगे अपील की जा सके,लेकिन अगर अपील पर सुनवाई के लिए बरसों इंतजार करना पड़े,तो इस क़ानून के इस्तेमाल को निरर्थक साबित करने जैसा ही व्यवहार है।
सूचना देने के मामलों में लापरवाही का एक बड़ा कारण यह है कि सूचना देने से इनकार करने या आनाकानी करने वाले अधिकारियों में अभी यह भय नहीं है कि वे दंडित किए जा सकते हैं। छोटे-मोटे दंड से तो वे घबराते ही नहीं, अलबत्ता जेल जाने से थोड़ा घबराते हैं क्योंकि इसमें उनकी नौकरी जाने का खतरा मौजूद रहता है। यों सूचना के अधिकार कानून के तहत दंडात्मक कार्यवाई का प्रावधान है, परंतु कई अध्ययन बताते हैं कि ऐसे मामलों को अंगुलियों पर गिना जा सकता है,जिनमें इस प्रावधान का प्रयोग हुआ हो।बहरहाल,इस कानून को भ्रष्टाचार से लड़ने का एक कारगर हथियार बनाए रखना और बचाना आवश्यक है। इसके लिए जरूरी है कि सूचना आयोगों की शक्ति और संसाधन दोनों को बढ़ाया जाए।अपराध करने,इन्हे बढ़ावा देने और अनियमितता बरतने वालों के मन में भय पैदा हो।

हाल ही दिल्ली हाईकोर्ट ने एक याचिका पर फैसला दिया है कि किसी दूसरे साधन से सूचना मिलने पर भी आरटीआई का उपयोग किया जा सकता है और इसके जरिए सूचना हासिल करने की मांग की जा सकती है।याचिका में नगरीय विकास मंत्रालय और सीबीआई के अफसरों के बीच भ्रष्टाचार के मामले में हुई बातचीत का खुलासा करने की अपील की गई थी।लेकिन मंत्रालय ने संबंधित कोर्ट केस में बाधा पड़ने के आधार पर जानकारी देने से मना कर दिया था। आरटीआई अर्जी लगाने वाला सूचना आयुक्त के पास गया। आयुक्त ने भी मंत्रालय के सूचना देने को जायज करार दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई जिस पर जस्टिस विभु बखरु ने कहा कि कोई कारण नहीं बताया गया कि मांगी गई जानकारी का खुलासा करने से मुकदमे में कैसे बाधा आएगी।याचिकाकर्ता ने जो सूचना मांगी है वह प्रासंगिक या आवश्यक है या नहीं यह भी सूचना हासिल करने के लिए कोई शर्त नहीं है। ऐसे में याचिकाकर्ता को सूचना हासिल करने से नहीं रोका जा सकता।

जनसेवा की दृष्टि से समय-समय पर अनेक आयोगों का गठन होता रहा है।प्रदेश में उनकी दशा कमोबेश सूचना आयोग जैसी ही है। इन महत्वपूर्ण आयोगों में अध्यक्ष और सदस्यों के रिक्त पदों के चलते काम नहीं हो रहा एवं नागरिक परेशान हो रहे हैं। राज्य उपभोक्ता संरक्षणआयोग,मानव अधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग,बाल संरक्षण आयोग,नि:शक्तजन आयोग आदि में पद खाली पड़े हैं।इससे इन आयोगों का होना भी कोई अर्थ रखता। नई सरकार अपने गठन का एक साल पूरा होने का जश्न भी मना चुकी है। ऐसे में सरकार के कामकाज और उसकी मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है।पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आयी सरकार को यथाशीघ्र फैसले कर जनता की बढ़ती जा रही मुश्किलों का समाधान करने का मार्ग प्रशस्त करना होगा,तभी आमजन में नए विश्वास का संचार होगा।  -फारूक आफरीदी


शनिवार, 10 जनवरी 2015

हमें प्रवासी भारतवंशियों का विश्वास जीतना होगा



         
संपादकीय

हमें प्रवासी भारतवंशियों का विश्वास जीतना होगा

गुजरात के गांधीनगर में 13वें प्रवासी भारतीय दिवस में भारतवंशियों से देश के विकास में और ज्यादा जुडने की अपील करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले यह कहा हो कि नयी मजबूती से भारत का 'उदय' होने के साथ उनके लिए देश में बहुत सारी संभावनाएं इंतजार कर रही हैं लेकिन इसके लिए उन्हें भारत को तैयार भी करना होगा।हमें भारतवंशियों का सहयोग लेना है तो उसके अनुरूप आचरण भी करना होगा, जो केवल बातों से संभव नहीं होगा। मोदी ने यह भी कहा कि पूरी दुनिया बड़ी उम्मीदों के साथ भारत की तरफ देख रही है और उसमें विश्वास एवं क्षमता की जरुरत है।यही विश्वास और क्षमता जगाने की ही तो  जरूरत है।यह किसी से छिपा नहीं कि अभी प्रवासी बंधु भारत के साथ अपना हाथ बढ़ाने में हिचकिचाते हैं और यह एक कटु सच्चाई है।वजह साफ है,क्योंकि हम जो लच्छेदार बातें प्रवासियों के बीच करते हैं उसमें दम नहीं होता क्योंकि व्यवहार के स्तर पर हम खरे नहीं उतरते।हम अपनी कार्यप्रणाली को जब तक लचीला, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त नहीं बनाते तब तक किसी प्रवासी से कोई अनुकूल आशा नहीं कर सकते। महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के 100 साल पूरे होने के बीच इस साल प्रवासी दिवस मनाया जा रहा है।
भारतवंशियों को देश की 'बडी पूंजी' बताते हुए प्रधानमंत्री ने 200 से अधिक देशों में रह रहे इन ढाई करोड लोगों के इस समुदाय से देश को बदलने में मदद करने की अपील की हैभारतवंशी सचमुच बड़ी पूंजी तभी साबित होंगे जब हम उनका विश्वास हासिल कर पाएंगे।  मात्र यह कहने से काम नहीं चलेगा कि भारतीय मूल के लोग हमारी पूंजी और ताकत हैं। प्रधानमंत्री ने दुनिया भर में देश के सम्मान के निर्माण की बात भी कही है। यह सम्मान वास्तविक रूप में स्थापित करने के ठोस कदमों की आवश्यकता है। देश में शांतिपूर्ण और सदभावपूर्ण वातावरण को बहाल करने की भी महती आवश्यकता है।प्रधानमंत्री का यह कहना भी एक सच्चाई है कि भारत को बदलने में सरकार केवल 'पाउंड स्टर्लिंग और डॉलर' में रुचि नहीं रखती, लेकिन भारतवंशियों के दिमाग में तो यही है कि हमारा देश उनसे केवल पूंजी निवेश की ही आशा रखता है जबकि उन्होंने विदेशों में अपने उद्यम और पुरुषार्थ के बल पर धन और यश अर्जित किया है। भारत उनके साथ भावनात्मक ब्लेकमेल करके सहयोग लेना चाहता है। ऐसे में उनके दिमागों को साफ करना होगा। ऐसे प्रवासी सम्मेलन पहले भी हुए और सहयोग की अपीलें भी हुई, लेकिन नतीजे ढाक के तीन पात ही रहे। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि प्रवासी बंधु तभी आएंगे जब उन्हे यहां पूंजी निवेश में मुनाफा दिखाई देगा।उनको जब महसूस होगा कि सरकारी मशीनरी का रवैया उनके साथ परेशानी से भरा, उलझाऊ और उनका समय बर्बाद करने वाला नहीं है तो वे जरूर आएंगे। उन्हें भारत के साथ भावनात्मक दृष्टि से भी जोड़े रखना हमारा दायित्व बनता है। प्राकृतिक आपदाओं के समय उनका मदद करना एक अलग बात है। ऐसी सहायता तो पीड़ित मानवता की सेवा समझकर कोई भी कर देता है, इसमें भारतीय प्रवासी होना जरूरी भी नहीं।             
केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से पीआईओ और ओसीआई कार्ड को मिलाने और कई देशों के लिए आगमन पर वीजा की सुविधाएं उपलब्ध कराने के संदर्भ में प्रवासी भारतीयों से किये गये वादों को पूरा करने की बात भी कही लेकिन अभी भी इसमें जो पैंच फंसा हुआ है वह दूर होना चाहिए। नौकरशाही की अड़ंगेबाजी दूर होनी चाहिए।इस सम्मेलन में सम्मिलित करीब 4000 भारतवंशियों को मोदी से बहुत उम्मीद है।जाहिर है इनमें से कुछ व्यापार विस्तार की आशाएँ लेकर आए हैं तो कुछ लोगों का मकसद इस सम्मेलन के बहाने भारत पर्यटन है,क्योंकि इन दिनों विदेशों में घूमने-फिरने के लिए छुट्टियाँ रहती हैं। यह सही है एक समय था जब ये प्रवासी अवसरों की तलाश में अपने प्रिय देश को छोडकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गए थे।अब समय के तेजी से बदलने और भारत के नयी ताकत के साथ उभरने के साथ बहुत सारी संभावनाएं बढ़ी हैं।इसके विपरीत ग्लोबलाईजेशन के साथ सभी देश बाहरी प्रवासियों से अपने यहां पूंजी निवेश के लिए सभी संभव जतन कर रहे हैं और रियायतों एवं सुविधाओं को लेकर भारी प्रतिस्पर्धा है। ऐसे में पूंजीनिवेश वहीं होगा जो सर्वाधिक सुरक्षित होगा।    
इस सम्मेलन को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से जोड़ने का प्रयास सराहनीय है।इस बहाने हमारे प्रवासी बंधु गांधीजी से कुछ तो परिचित होंगे। यहां यह कहना प्रासंगिक होगा कि आजादी के बाद जन्मी प्रवासी बंधुओं और उनकी युवा पीढ़ी को गांधीजी के जीवन दर्शन, उनके त्याग और अहिंसा के सिद्धान्त से देश को मिली खुली सांस के महत्व को समझाने की सबसे ज्यादा जरूरत है। केवल स्वछता ही गांधी का एकमात्र संदेश नहीं है। गांधीजी का पूरा जीवन ही अपने आप में एक संदेश है। यह बिलकुल सही है कि मानव विकास और दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियों के हल के लिए उनका दर्शन और शिक्षाएं आज भी दुनिया को प्रेरित कर रही हैं।इसी को स्वीकार करते हुए यूपीए सरकार के प्रयासों के फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनके जन्मदिवस को अहिंसा दिवस के रूप में घोषित किया।इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि महात्मा गांधी के दर्शन से बेहतर कुछ नहीं है। मोदी की भारतवंशियों से स्वच्छ गंगा मिशन में शामिल होने की अपील इसलिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि यह अभियान धार्मिक होने के साथ पर्यावरण के लिहाज से भी उपयोगी है।         
इसमें भी कोई दो राय नहीं कि  विश्व के लोग हर भारतीय को सम्मान की नजर से देखते हैं। उनका अमीर होना इसका कारण नहीं है, बल्कि भारत के गौरवशाली इतिहास, परंपरा और हमारे जीवन मूल्यों की वजह से उनका आदर होता है। ऐसे में हर प्रवासी भारतीय का  दायित्व है कि वह  देश की तरक्की में अपना योगदान दे।यह भी सही है कि आजादी के बाद अधिकांश समय तक केन्द्र में कांग्रेस का शासन रहा जिस पार्टी का सवा सौ वर्षों से ज्यादा का समृद्ध इतिहास है और जिसके महान नेताओं की दुनिया में धाक रही है और यह बार पहली बार है कि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के अकेले बलबूते पर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाली है। इस सरकार की आर्थिक नीति, विदेश नीति सहित विभिन्न मोर्चों पर अभी परख होनी है। यह समय मोदी के सामने अग्निपरीक्षा का है जिस पर उन्हें खरा उतरकर दिखाना है। उनके नेतृत्व को लेकर दुनिया का हर देश भारत की ओर देख रहा है। इसके लिए उनका अपने छह महीने के कार्यकाल में 50 से अधिक विश्व नेताओं से मिलना ही सफलता का पैमाना नहीं है। उन्हें सभी देशों का विश्वास अपनी कार्य शैली और नतीजों से जीतना होगा। गांधीजी ने हर व्यक्ति के मन में स्वतंत्रता की भावना जागृत की थी। उन्होंने इसे एक जनआंदोलन बनायाविविध धर्मों, समुदायों, भाषाओं और संस्कृतियों के इस देश में सदभाव स्नेह और सभी के प्रति सम्मान की यह भावना आज भी उतनी ही महत्व रखती है और इसे बरकरार रखना होगा।इसके लिए व्यापक दृष्टि का परिचय देना होगा जो प्रधानमंत्री के लिए उनके ही अपने पार्टी नेताओं के कारण चुनौती बना हुआ है। 
-फारूक आफरीदी